Sunday, 18 October 2015

                  जनसत्ता के रविवारीय में मेरी कवितायें


राष्ट्र

प्रधानमंत्री ने कहा
वितमंत्री ने कहा
रेलमंत्री ने कहा
बचानी चाहिए राष्ट्रभाषा

भाषा में राष्ट्र को
बचाने की बात हो रही थी
गोया यूँ कहें मियाँ
कि राष्ट्रभाषा में देश को बचाने की मुहीम में
जो भी आतंकी पकडे जा रहे थे
सब के सब मुसलमान थे

राष्ट्रभाषा के नाम पर
बचाया जा रहा था भाषा में राष्ट्र
शिक्षामंत्री खुश थे

सातवीं क्लास की हिन्दी पाठ्यपुस्तक में
शामिल हो चुके थे आसाराम
जय हो मुक्तिबोध
जय नागार्जुन बाबा
सबकी जय हो




राजा

जिसके हाथों में सब कुछ था
वही खुश था
बाकी सब नासमझ थे
इस सदी में भी हर एक गली में
हर एक घर में एक राजा था
जिसके नीचे चार पांच की आबादी थी
उसी का हुक्म चलता था

आजकल

वह आजकल  इस तरह आती है
जैसे भूली हुयी कविता की
कोई पंक्ति हो 
मैं रुकने के लिए कहता हूँ तो तडकसार कहती है-
जा परे भूले हुओं  को एवें मुंह नहीं लगाते

फिर चली जाती है बड़े-बड़े कदमों से
जैसे गाँव का कोई साहूकार हो

रजाई में दुबककर बैठ जाता हूँ
उसका अब कोई भरोसा नहीं
क्या पता
वह कब साहूकारों की तरह आये
और भूली हुयी कविता की तरह चली जाए
                                         
हरप्रीत कौर 



No comments:

Post a Comment