Thursday, 3 November 2016
Wednesday, 21 October 2015
भाप
वे बोलते थे
और शब्द नहीं भाप निकलती थी जुबान से
भाप के शब्द भाप का इंजन बनाते
उड़ते थे हवा में
छुक-छुक करती रेलगाडिया चलती थी
पीछे पीछे
हैरान थे रेलमंत्री
लोगों ने अपनी अपनी भाप से
अपनी अपनी गाड़ियां तैयार कर ली थीं
और चले ही जा रहे थे उन पर सवार
ऐलान था उनका
जिनके मूह से शब्द नहीं भाप निकलती है
सब के सब देशद्रोही हैं
हरप्रीत कौर
Monday, 19 October 2015
Sunday, 18 October 2015
जनसत्ता के रविवारीय में मेरी कवितायें
राष्ट्र
प्रधानमंत्री ने कहा
वितमंत्री ने कहा
रेलमंत्री ने कहा
बचानी चाहिए राष्ट्रभाषा
भाषा में राष्ट्र को
बचाने की बात हो रही थी
गोया यूँ कहें मियाँ
कि राष्ट्रभाषा में देश को बचाने की मुहीम में
जो भी आतंकी पकडे जा रहे थे
सब के सब मुसलमान थे
राष्ट्रभाषा के नाम पर
बचाया जा रहा था भाषा में राष्ट्र
शिक्षामंत्री खुश थे
सातवीं क्लास की हिन्दी पाठ्यपुस्तक में
शामिल हो चुके थे आसाराम
जय हो मुक्तिबोध
जय नागार्जुन बाबा
सबकी जय हो
राजा
जिसके हाथों में सब कुछ था
वही खुश था
बाकी सब नासमझ थे
इस सदी में भी हर एक गली में
हर एक घर में एक राजा था
जिसके नीचे चार पांच की आबादी थी
उसी का हुक्म चलता था
आजकल
वह आजकल इस तरह आती है
जैसे भूली हुयी कविता की
कोई पंक्ति हो
मैं रुकने के लिए कहता हूँ तो तडकसार कहती है-
जा परे भूले हुओं को एवें मुंह नहीं
लगाते
फिर चली जाती है बड़े-बड़े कदमों से
जैसे गाँव का कोई साहूकार हो
रजाई में दुबककर बैठ जाता हूँ
उसका अब कोई भरोसा नहीं
क्या पता
वह कब साहूकारों की तरह आये
और भूली हुयी कविता की तरह चली जाए
हरप्रीत कौर
Subscribe to:
Posts (Atom)

